VIVEK SATAY KO KHOJ NIKALTA HAI- Here you can easily solve UPSC Mains Essay (2022) – निबंध लिखिए

By | August 30, 2021

अब हम जानेंगे कि VIVEK SATAY KO KHOJ NIKALTA  इसका क्या अर्थ हैं। इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

Hello दोस्तों मैं आपका upscsite.in में स्वागत करती हूँ। आज हम निबंध VIVEK SATAY KO KHOJ NIKALTA इसके बारे में- पूरे एक हज़ार शब्दों का निबंध लिखना सीखेंगे तो आइए शुरू करते हैं-

VIVEK SATAY KO KHOJ NIKALTA

शायद आज किसी व्यक्ति से यह प्रश्न किया जाएं, सूर्य केंद्र में हैं या पृथ्वी? कौन किसका चक्कर लगाता हैं? तो आसानी से इसका उत्तर दे सकते हैं कि सूर्य केंद्र में हैं। 

मध्यकाल तक इसको लेकर सम्भवतः सर्वसम्मति रही होगी कि पृथ्वी केंद्र में हैं, तथा सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता हैं।

अथवा ऐसा भी हो सकता हैं कि जब चर्च या पादरियों ने बता ही दिया कि पृथ्वी केंद्र में हैं, तो फिर किसी ने इस पर संदेह व्यक्त करने की हिम्मत नहीं जुटाई होगी।

लेक़िन कुछ विवेकशील मनुष्यों को इस तथ्य की प्रामाणिकता पर संदेह हुआ होगा। उनके विवेक ने सत्य की खोज के लिए उन्हें प्रेरित किया होगा।

अंततः वह इस सत्य तक पहुंच ही गए, कि ‘पृथ्वी नहीं बल्कि सूर्य केंद्र’ में है तथा पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है।

Vivek Satay Ko Khoj Nikalta

कहा भी जाता है कि सत्य कड़वा होता है। सत्य जब हमारे सामने आता है तो उसे स्वीकारना आसान नहीं होता है। मध्यकाल में चर्चे की सत्ता को चुनौती देना कितना कठिन था।

परन्तु इस बात को हम अच्छी तरह जानते हैं, इसके बावजूद कॉपरनिकस बू्रनो व गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों ने अपने विवेक के बल पर यह खोज करने का प्रयत्न किया कि..

वास्तव में सत्य क्या है? और समाज के विपरीत अपने मत का प्रतिपादन किया ब्रूनो को तो सत्य की खोज के लिए जिंदा जला दिया गया।

उदाहरण स्वरुप नवजागरण के दौर में ईश्वर चंद्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले इत्यादि समाज सुधारक अपने विवेक से इससे सत्य तक पहुंचेगी।

सती प्रथा बाल विवाह छुआछूत जैसी प्रथाएं भारतीय समाज का सर्वकालिक सत्य नहीं है और ना ही यह रूढ़िवादी परंपराओं अन्य समाज में मौजूद है । अतः भारतीय समाज में व्याप्त इन रोड व्रत त्योहार प्रथाओं को दूर करने का इन्होंने आह्वान किया।”

इसी क्रम में निबंध के शीर्षक

VIVEK SATAY KO KHOJ NIKALTA के अनुरूप एक कहानी चर्चा करना महत्वपूर्ण है।

एक बार एक राजा के दरबार में दो महिलाएं आई, जो किसी बच्चे को लेकर अपना-अपना दावा प्रस्तुत कर रही थी। इस परिस्थिति में राजा के लिए नया करना मुश्किल हो गया, आधुनिक काल के समान उस समय डीएनए जैसे तकनीक भी नहीं थी, जिसे समस्या का उचित समाधान किया जा सके तथा न्याय हो सके।

राजा ने अपने विवेक का प्रयोग किया – राजा ने क्रोधित होकर कहा तलवार से इस बच्चे के दो हिस्से कर दिए जाए और दोनों महिलाओं को एक-एक हिस्सा दे दिया जाए।

राजा के इतना कहते ही उनमें से एक महिला ने तुरंत कहा महाराज आप बच्चे को इस महिला को दे दीजिए।

उस महिला के मुख से ऐसी बात सुनकर राजा समझ गए कि बच्चा किसका है और सत्य सामने आ गया।

उपयुक्त कहानी से या प्रतीत होता है, कि VIVEK SATAY KO KHOJ NIKALTA है। विशेष रूपिया भी है कि इस व्यवहारिक अनुप्रयोग में नैतिक मूल्य अनिवार्यता शामिल होते हैं।

इसके अतिरिक्त विवेक में बुद्धि पक्ष के साथ-साथ भावनाओं का भी संतुलित सामंजस्य होता है।

  • अब सवाल यह है कि
    • VIVEK, SATAY KAISE KHOJ NIKALTA HAI?
    • सत्य की खोज के लिए क्या विवेक ही रास्ता उपलब्ध कराता है?
    • उल्लेखनीय है कि विवेक अनुभव, ज्ञान, नैतिकता से संपृक्त होने के कारण निर्णय की गुणवत्ता को बढ़ा देता है।

विवेकशील मनुष्य दूसरों की बातों या अन्य व्यक्तियों के द्वारा बनाए हुए, रास्ते का अंधानुकरण नहीं करता है। बल्कि अपनी तार की कथा व स्वतंत्र चिंतन से उसे टटोलने का प्रयत्न करता है।

जब उसका विवेक इस बात को स्वीकार कर लेता है, कि उपयुक्त बात में सटीकता तभी वह उस बात को स्वीकार करता है या उस रास्ते पर चलता है।

उदाहरण के रूप में ईश्वर चंद्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले इत्यादि समाज सुधारक अपने विवेक से इस सत्य तक पहुंचे सती प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत जैसी प्रथाएं

भारतीय समाज समाज का सर्वकालिक सत्य नहीं है और ना ही यह रूढ़िवादी परंपराओं अन्य समाज में मौजूद है।

अतः भारतीय समाज में व्याप्त प्रथाओं को दूर करने का उन्होंने आह्वान किया। दूसरी और ब्रिटिश शासन ‘श्वेत नस्ल भार का सिंद्धान्त’ के तहत भारतीयों को अपने शासन को वैध बताता रहा। 

भारतीय बुद्धिजीवियों ने इस मत या असत्य को सिरे से नकार दिया। निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस सिद्धांत के माध्यम से सत्य को वितरित करके भारतीयों का अत्यधिक शोषण किया जा रहा है। उनके धन को लूट कर ब्रिटेन पहुंचाया जा रहा है।

जब तक व्यक्ति संदेह में व्याप्त रहेगा। वह सत्य तक नहीं पहुंच सकता हालांकि इससे सहमत हुआ जा सकता है, कि पूर्व में जिन बातों को लेकर धारणा थी कि उपयुक्त मत पूर्णतः सत्य है।

अगर लोगों के मन में इस तथ्य की सटीकता को लेकर संदेह उत्पन्न नहीं होता, तो असत्य से सत्य की दिशा में पहला कदम नहीं बढ़ाते।

अब प्रश्न यह भी उठता है कि क्या सत्य परिवर्तित होता है? या प्रश्न इसलिए भी प्रसांगिक हो जाता है, क्योंकि एक समय तक जिस बात को सत्य माना जाता है

उसे बाद में असत्य की श्रेणी में क्यों शामिल कर दिया जाता है? वस्तुतः सत्य परिवर्तित नहीं होता है। बल्कि उसके ऊपर अनेक परत चढ़ी होती है।

विवेक अनेक राहों से गुजरते हुए, वह उनसे सीखकर अपने अनुभव परिश्रम व ज्ञान के सम्मिलित प्रयासों के जरिए सत्य को खोजता है।

जैसा कि लंबे समय तक इसे शक्ति माना जाता रहा है, कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कमजोर वहीं है। अतः उनके अधिकार भी पुरुषों से कम होने चाहिए।

परंतु आधुनिक काल में विवेक प्रमाणिक सत्य तक पहुंचा कि, महिलाएं किसी भी पुरुषों की तुलना में कमजोर नहीं है – “स्त्री पैदा नहीं होती बना दी जाती है”।

उपयुक्त विवरण के पश्चात निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है, कि विवेक, तर्क-वितर्क, सत्य-असत्य आदि। समस्त पक्ष का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए व अभ्यास तथा व्यवहारिक अनुप्रयोग से शक्ति को खोज लेता है।

यह उन सभी मतों का एक साथ खंडन कर देता है। जो असत्य होते हुए भी सत्य जैसे प्रतीत होते हैं। उन्हें लेकर समाज में लगभग स्वीकारोक्ति है कि यह मत सत्य है।

विवेक किसी अन्य व्यक्ति या मत के द्वारा नियंत्रित नहीं होता, अपितु निष्पक्षता पूर्वक सत्य तक पहुंच जाता है।

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आपको इस आर्टिकल में VIVEK SATAY KO KHOJ NIKALTA शीर्षक का एक हज़ार शब्दों में निबंध लिखा गया। इसे सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वालों के साथ अवश्य शेयर करें ताकि उन्हें समझने में आसानी होगा।

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